Mp पूरे विश्व की इकलौती ऐसी गणेश प्रतिमा, जिसके आगे-पीछे से दर्शन होते हैं, क्या है गजानन की टेढ़ी गर्दन का राज, जाने…

गणेश प्रतिमागणेश प्रतिमा: 31 अगस्त से गणेशोत्सव शुरू हो रहा है। गणेश पुराण के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश का जन्म हुआ था। इस साल भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी 30 अगस्त को दोपहर 3:34 बजे से शुरू होगी. इसका समापन 31 अगस्त को दोपहर 3:23 बजे होगा।

पद्म पुराण के अनुसार भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल में स्वाति नक्षत्र में हुआ था। इसी कारण इस समय गणेश जी की स्थापना और उनकी पूजा करना अधिक शुभ और लाभकारी माना जाता है। यह गणेशोत्सव और उसके मुहूर्त की बात है। अब हम आपको दो मुखी गणेश मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं। एक ही पत्थर पर बनी 8 फीट ऊंची दो मुखी प्रतिमा शायद दुनिया में और कहीं नहीं है।

यह गणेश प्रतिमा मंदिर मंदसौर में श्री द्विमुखी चिंताहरण गणपति के नाम पर है

मूर्ति ‘गणेश स्थानक’ है। यानी गणेश जी खड़ी स्थिति में हैं। मूर्ति का अगला रूप पंचसुंडी (पांच सूंड) है और पीछे की तरफ गणेश भगवान सेठ की मुद्रा में हैं। पिछले चेहरे में सूंड और सिर पर पगड़ी है। यह श्रेष्ठिधर सेठ के रूप में गणेश का प्रतिनिधित्व करता है। सामने मुख पर पाँच सूंड होती हैं, इन बाधाओं को गणेशजी कहते हैं। पांचों सूंडों की दिशा बाईं ओर होती है, जबकि पीछे वाले मुख की सूंड दाईं दिशा में होती है।

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इतिहास भी जानिए, कहां से मिली थी मूर्ति

यह मूर्ति 9वीं शताब्दी की बताई जाती है। भगवान गणेश की यह दो रूपों वाली मूर्ति जितनी अलौकिक है, उतनी ही अनोखी इसकी कहानी भी है। मंदिर के पुजारी सत्यनारायण जोशी ने बताया कि मूलचंद बसब मंदसौर में सराफ हुआ करते थे. उनके सपने में गणेश जी प्रकट हुए और उन्हें शहर के नाहर सैयद तालाब से बाहर निकालने के लिए कहा।

वह स्वयं तालाब में गया और स्वप्न में वर्णित स्थान से मिट्टी हटाई, वहां मूर्ति मिली। बात 22 जून 1929 की है। तब शहर में धान की मंडी हुआ करती थी। मूलचंद जी ने मण्डी आकर अपने स्वप्न और मूर्ति के बारे में यहाँ एकत्रित व्यापारियों को बताया। इसके बाद सभी ने तालाब में जाकर गणेश जी के दर्शन किए। यह निर्णय लिया गया कि प्रतिमा को शहर के नर्सिंगपुरा में स्थापित किया जाएगा।

सभी लोग मूर्ति को बैलगाड़ी में लेकर निकले। अब जहां मंदिर है, उस समय यहां दो नीम के पेड़ थे। यहां बैलगाड़ी आई, लेकिन उसके बाद वह आगे नहीं बढ़ी। लाख कोशिशों के बाद भी बैल बैलगाड़ी को खींच नहीं पाए। सभी ने तय किया कि गणेश जी यहां बैठना चाहते हैं।

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इसके बाद यहां पर ही मूर्ति की स्थापना की गई। तब इस जगह का नाम इलायची चौक हुआ करता था। प्रतिमा की स्थापना के बाद इसका नाम गणपति चौक हो गया।

चोला चढ़ाने के लिए आपको 4 साल इंतजार करना होगा

द्विमुखी गणेश जी को चोला चढ़ाने के लिए 4 साल इंतजार करना पड़ता है। मंदिर ट्रस्ट के सदस्य गोपाल मंडोवारा ने बताया कि गणेश जी को हर बुधवार को चोला चढ़ाया जाता है. चिंताहारन गणेश जी को चोला चढ़ाने के लिए भक्तों को पूरे तीन से चार साल तक इंतजार करना पड़ता है। कार्यक्रम पूरे वर्ष आयोजित किए जाते हैं।

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